पेपर कोड: #431 | कुल प्रश्न: 24 | नेगेटिव मार्किंग: 0 | समय: 30 मिनट | कठिनाई स्तर: सामान्य
आधुनिक शिक्षा प्रणाली में प्रौद्योगिकी के समावेश ने शिक्षण और अधिगम के तरीकों में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। 'स्वयं' (SWAYAM) और 'अध्यापन' से जुड़े विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने शिक्षा को अधिक समावेशी और सुलभ बना दिया है। शिक्षण-अधिगम में आईसीटी (ICT) का उपयोग केवल जानकारी देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षार्थियों के बीच उच्च स्तरीय चिंतन कौशल (High-Order Thinking Skills) को विकसित करने में मदद करता है। मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स (MOOCs) के माध्यम से छात्र अपनी गति और सुविधा के अनुसार सीख सकते हैं। हालांकि, डिजिटल विभाजन (Digital Divide) और ऑनलाइन शिक्षण में प्रत्यक्ष मानवीय अंतःक्रिया की कमी अभी भी ऐसी चुनौतियाँ हैं जिनका समाधान किया जाना आवश्यक है।
प्रभावशाली शिक्षण केवल विषय वस्तु के ज्ञान का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी वातावरण प्रक्रिया है जहाँ शिक्षक और छात्र मिलकर ज्ञान का सह-निर्माण करते हैं। आधुनिक शिक्षाशास्त्र में शिक्षक की भूमिका एक 'ज्ञानदाता' से बदलकर एक 'सुगमकर्ता' (Facilitator) की हो गई है। समावेशी शिक्षा के वातावरण में कक्षा में विविध पृष्ठभूमियों, क्षमताओं और रुचियों वाले विद्यार्थी शामिल होते हैं। एक सफल शिक्षक वह है जो विभेदित अनुदेशन (Differentiated Instruction) का प्रयोग करता है और प्रत्येक छात्र की आवश्यकताओं के अनुकूल शिक्षण रणनीतियों को ढालता है। इसके अतिरिक्त, कंप्यूटर आधारित परीक्षण (CBT) और ऑनलाइन शिक्षण साधनों के आगमन ने मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बढ़ाई है। हालाँकि, केवल तकनीकी साधनों का उपयोग पर्याप्त नहीं है; जब तक छात्र स्वयं आंतरिक रूप से प्रेरित (Intrinsically Motivated) नहीं होते, तब तक स्थायी अधिगम संभव नहीं है। अतः शिक्षण में संज्ञानात्मक (Cognitive) विकास के साथ-साथ भावात्मक (Affective) और मनोप्रेरणा (Psychomotor) पक्षों का संतुलन अनिवार्य है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया में व्यापक बदलाव का प्रस्ताव करती है। यह पारंपरिक रटंत प्रणाली (Rote Learning) से हटकर संप्रत्ययात्मक समझ (Conceptual Understanding), आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking) और अनुभवात्मक अधिगम (Experiential Learning) पर बल देती है। NEP 2020 के अनुसार, उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षण अभिवृत्ति को इस प्रकार विकसित किया जाना चाहिए कि वह शिक्षार्थियों में 21वीं सदी के कौशल जैसे- समस्या समाधान, रचनात्मकता और डिजिटल साक्षरता का विकास कर सके। इसके अतिरिक्त, मूल्यांकन प्रणाली को केवल अंतिम परीक्षाओं तक सीमित न रखकर सतत और व्यापक मूल्यांकन में परिवर्तित करने की सिफारिश की गई है।